/इसलिए भिड़े थे Babulal Nagar और Ved Prakash Solanki: Sachin Pilot Camp VS Ashok Gehlot Camp

इसलिए भिड़े थे Babulal Nagar और Ved Prakash Solanki: Sachin Pilot Camp VS Ashok Gehlot Camp

समय पलटने की कहानियां अक्सर आप लोगो ने सुनी होगी, पर आज मैं आपको बताने वाली हूँ की कैसे मेहनत का फ़ल मिला और मंत्री पद भी मिला पर फिर कुछ ऐसा हुआ की ना तो मंत्री पद रहा ना और कुछ. उसके बाद दोबारा राजनीति में आना चाहां तो उसी पार्टी ने हाथ खीच लिया जिसने मंत्री पद दिया था. इसी के साथ किस्सा उस इंसान का भी जो जिसे मंत्री बनाया किसी और ने पर मौका आने पर साथ दिया दुसरे का.. आज आपको बताने वाली हूँ की क्यों भिड़े थे बाबूलाल नागार और वेद प्रकाश सोलंकी. और क्या इन दोनों की पूरी कहानी.

अभी राजस्थान की सियासत का पारा चढ़ा है पर इस बार ना तो वजह है सचिन पायलट और ना ही है अशोक गहलोत. बल्कि इस बार तो वजह है गहलोत और पायलट गुट के विधायक जिन्होंने एक दुसरे पर तीखे बयान दे कर राजस्थान की सियासत का पारा चढ़ा दिया है.  

राजनीति अनिश्चितता का खेल है। कब कौनसा नेता किसके पाले में चला जाए, यह नहीं कहा जा सकता है। राजनीतिक मजबूरियां भी एक दूसरे के संग या खिलाफ ले आती है। जयपुर के दो विधायकों की कुछ ऐसी ही कहानी है। दलित वर्ग से आने वाले दूदू से निर्दलीय विधायक बाबूलाल नागर और चाकसू से कांग्रेस विधायक वेदप्रकाश सोलंकी किसी समय सीएम अशोक गहलोत का झंड़ा उठाकर चला करते थे। गत विधानसभा चुनाव से पहले सोलंकी ने पायलट का हाथ थाम लिया था। वहीं नागर आज भी गहलोत के संग है और उन्हें अपना भगवान मानते है। आज ये दोनों विधायक एक दूसरे के खिलाफ वार और पलटवार कर रहे है।

बाबूलाल नागर दूदू से चौथी बार विधायक बने है। नागर को सेवादल का अध्यक्ष रहते 1998 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक गहलोत ने राजनीति का पहला मौका दिया। नागर इस सीट से चुनाव जीत गए। इस दौरान गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस आठ साल बाद राजस्थान में सत्ता में आई थी। कांग्रेस को 156 सीटें मिली और सीएम का सेहरा गहलोत के माथे पर बंधा। इसके बाद नागर साल 2003 और 2008 में भी दूदू से चुनाव जीते। गहलोत दुबारा 2008 में सीएम बने और नागर को डेयरी और खाद्य आपूर्ति विभाग का मंत्री बनाया गया। इसी सरकार के अंतिम साल आते आते विधायक और मंत्री नागर एक महिला से दुष्कर्म के आरोप में फंस गए और उनका मंत्री पद चला गया और वे जेल पहुंच गए।

साल 2013 में कांग्रेस ने बाबूलाल नागर का विधानसभा चुनाव में टिकट काट दिया। उनकी जगह कांग्रेस ने उनके जिला प्रमुख भाई हजारी लाल नागर को टिकट दिया, लेकिन वो हार गए। इस दौरान नागर जेल में ही थे। नागर को कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका था। इस दौरान लग रहा था कि नागर का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया।

विधायक बाबूलाल नागर की किस्मत फिर पलटी और वे अदालत से साल 2017 में बरी हो गए और फिर से बाहर आकर राजनीति में सक्रिय हो गए। नागर को साल 2018 में कांग्रेस के टिकट का दावेदार माना जा रहा था लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया और एक नए चेहरे रितेश बैरवा पर दांव खेला लेकिन ये दांव फेल हो गया और बाबूलाल नागर ने निर्दलीय चुनाव जीत लिया।

वहीं चाकसू से विधायक वेदप्रकाश सोलंकी पहली बार चाकसू से विधायक बने है। वे 2008 में भी चुनाव लड़े थे लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। साल 2013 में उन्हें टिकट नहीं मिला। 2018 में उन्हें मौका मिला और वे पहली बार विधायक बने। सोलंकी ने शुरूआत से अपना राजनीतिक आका अशोक गहलोत को माना था। शुरूआत में सोलंकी जयपुर शहर एनएसयूआई के अध्यक्ष थे। गहलोत ने सोलंकी और नागर का राजनीतिक कैरियर बढाया। लेकिन सोलंकी गत चुनाव से पहले ही सचिन पायलट के संग चले गए।

दोनों विधायकों की राजनीतिक अदावत पुरानी है। इसके पीछे वजह ये हैं कि दोनों की एक ही जाति दलित वर्ग से आते है और उसमें भी ये दोनों एक ही समाज से है और दोनों की विधानसभा इलाके भी जुड़े हुए है। एक ही जाति वर्ग के होने की वजह से ये दोनों नेता दलित वर्ग के बड़े नेता बनना चाह रहे है। डेयरी लाइसेंस के मामले को लेकर भी दोनों नेता एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए थे।

विधायक बाबूलाल नागर ने अभी हाल में ही सचिन पायलट को लेकर कहा था कि उनकी वजह से कांग्रेस 99 पर ही अटक गई थी। जबकि टिकटों का सही वितरण होता तो कांग्रेस की 150 सीटें आती। हर गलती कीमत मांगती है। हारे हुए और जमानत जब्त प्रत्याशियों को टिकट देने का पायलट को दोषी बताते हुए कहा कि उन्हें तो कांग्रेस आलाकमान से माफी मांगनी चाहिए। इसके बाद सोलंकी ने नागर के लिए कहा था कि नागर खुद ही कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़कर आए है और उनका टिकट क्यों काटा गया था, सबको पता है।

समय सबसे बलवान होता है ऐसे ही नहीं कहा जाता, और जो समय के साथ चलता है वो ही आगे बढ़ जाता है. राजनीति में समय का बड़ा महत्व होता है यहाँ ज्यदातर चीज़े सिर्फ और सिर्फ सही समय और सही मौके को देख कर बदल ली जाती है..फिर चाहे बाबु लाल नागर का निर्दलीय चुनाव लड़ना हो या फिर वेद प्रकाश सोलंकी का सचिन पायलट खेमे में आना हो.

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