राजस्थान और राजस्थान की राजनीति ऐसे ही हर किसी के लिए आश्चर्य का विषय नहीं है. ये अगर हर किसी को समझ आ जाये तो फिर बात ही क्या..इस बात को ऐसे समझिये की राजस्थान में जाट समुदाय वोटिंग के लिहाज से काफी अहमियत रखता है पर उसके बाद भी आज तक जाट जाति का cm नहीं बन पाया है. आसन शब्दों में ये की जो जाति cm बनवा सकती है पर आज तक अपने ही जाति का cm नहीं बना पाई.

राजस्थान में जाट एक किसान कौम है आजादी के बाद राजतंत्र समाप्त हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई. सामंती-जमींदारी खत्म होने के बाद राजपूत कांग्रेस के खिलाफ हो गए तो किसान वर्ग या जाट समुदाय अपनी जमीन वापस मिलने पर कांग्रेस के साथ खड़े हो गया. भेरो सिंह शेखावत और वसुंधरा राजे को छोड़ दे तो राजस्थान में कांग्रेस का हमेशा से दबदबा रहा है. पर उसके बावजूद भी कभी जाट मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. राजस्थान में दूसरी सबसे बड़ी कौम है जाट और इस बात को ऐसे समझिये की 1998 के बाद जाटो ने जिसका साथ दिया उसकी ही सरकार बनी. जाटो ने 1998 और 2008 में कांग्रेस का इसलिए साथ दिया की उनका मुख्यमंत्री बन जाए पर ऐसा हुआ नहीं. क्युकी हमेशा अशोक गहलोत पहली पंक्ति में मिले. राजस्थान में जाट आबादी की बात करे तो लगभग 12% है. गहलोत सरकार हो या वसुंधरा सरकार हो दोनों में ही जाटो का दबदबा हमेशा से रहा है. जैसा की हम सभी जानते है मारवाड़ और शेखावटी में जाटो का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है.  साथ ही नागौर, सीकर, झुंझुनू भरतपुर और जोधपुर को जात बेल्ट कहा जाता है. अगर आजादी के कुछ वक्त बाद की बात करे तो जाट वोटर्स को कांग्रेस का माना जाता था पर फिर वसुंधरा के जाट बहु के नारे ने पूरी पिचर बदल कर रख दी.

अगर इतिहास में जा कर देखे तो राजस्थान में जाट समाज को राजनीतिक और सामाजिक पहचान दिलाने में बलदेव राम मिर्धा को बड़ा श्रेय जाता है. 50 के दशक में मारवाड़ किसान सभा बना कर मिर्धा ने कांग्रेस के समानांतर संगठन खड़ा करने का प्रयास किया. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने बलदेव राम मिर्धा से मध्यस्थता कर भूमि सुधार से जुड़े अहम निर्णय लिए. जिसके बाद मारवाड़ किसान सभा और कांग्रेस की राह एक हो गई और सामंती-जमींदारी प्रथा के खिलाफ राजस्थान में जाट या किसान वर्ग कांग्रेस के झंडे तले लामबंद हो गए.        

बलदेव राम मिर्धा परिवार के दो सदस्य रामनिवास मिर्धा और नाथूराम मिर्धा के समय जाट राजनीति शिखर पर पहुची. राजस्थान का नागौर जिला इन्हीं के चलते जाट राजनीति का सियासी केंद्र बना. मिर्धा परिवार की राजनीतिक हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद जब कांग्रेस का उत्तर भारत से सफाया हो गया, तब विधानसभा चुनाव में मारवाड़ की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीत लीं. मिर्धा परिवार के अलावा परमराम मदेरणा और शीशराम ओला कांग्रेस के बड़े नेता रहें. जिन्होंने केंद्र से लेकर राज्य में अहम भूमिका निभाई. जाट समुदाय के अन्य नेताओं में विश्वेन्द्र सिंह, बाणमेर से बीजेपी सांसद कर्नल सोना राम, रिछपाल मिर्धा, ज्योति मिर्धा, रामरारायण डूडी, महीपाल मदेरणा सरीखे नामी गिरामी नेता रहे.

फिर समय आया अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे का. कांग्रेस के अशोक गहलोत और बाद में 2003 में वसुंधरा राजे के राजस्थान की राजनीति में उतरते ही चाहे जाट हो या राजपूत या ब्राह्मण इन प्रभावशाली जातियों के राजनीतिक वजूद को नियंत्रित कर दिया. जो नेता वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के लिए चुनौती बना उनका राजनीतिक वजूद या तो खत्म कर दिया गया या फिर वे हाशिये पर चले गए. मिर्धा परिवार, मदेरणा परिवार, ओला, घनश्याम तिवाड़ी हो या जसवंत सिंह जसोल के उदाहरण प्रत्यक्ष मौजूद हैं.  

जाट समुदाय के दिग्गज नेताओं की धमक राज्य और केंद्र में तो थी लेकिन ये कभी अपना मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए. आपको बता दूँ की राजस्थान की राजनीति में नागौर, सीकर, झुंझनू, भरतपुर और जोधपुर को एक तरह से जाट बेल्ट कहा जाता है. जाट समुदाय का लगभग 60 सीटों पर प्रभाव है. हनुमान बेनीवाल को जिस तरह से जाट युवाओं का समर्थन मिल रहा है. ये समाज बेनीवाल को राजस्थान के पहले जाट सीएम के तौर पर देखना चाहता है. तो अब देखना ये की क्या आने वाला समय जाट जाति के लिए वो कर पता है जो कई दशको से नहीं हुआ है.

ये थी राजस्थान संवाद की एक ख़ास रिपोर्ट कैसी लगी ये रिपोर्ट आप हमे कमेंट करके बता सकते है और साथ ही ऐसी ही और अपडेटस के लिए आज ही सब्सक्राइब करे हमारे चैनल राजस्थान संवाद को.